sachune ke narayan

आपके जीवन में भी है कोई नारायण जिसने बदला हो आपका जीवन / Aapke JIvan Me Bhi Hai Narayan

सभी के जीवन में होते है नारायण।

आपने वो गाना तो सुना ही होगापता नहीं किस रूप में नारायण मिल जाएगायकीन मानिए हमारे सभी के जीवन में ऐसे नारायण होते है.जो मिल जाने से हमारा जीवन बदल  जाता है.किसी के जीवन में वो नारायण उनके गुरु हो सकते है. किसी के जीवन में उनके दोस्त या सहकर्मी हो सकते हैं. किसी के जीवन में उनकी पत्नी हो सकती है.

ये नारायण हमारे जीवन में यैसे प्रवेश करते है, जैसे किसी बंजर जमीन पर उगा पौधा मरने को हो और अचानक बारिश हो जाए…. उस पौधे के लिए वो बरसात नारायण ही हुवी ना! Aapke JIvan Me Bhi Hai Narayan

तो आज जानते है कुछ यैसे लोगों के जीवन के नारायण के बारे में.नारायण आने से बदल गया इनका जीवन

“आचरेकर सर बने थे सचिन के नारायण”

सचिन तेंडुलकर: इसमें कोई दो राय नहीं की सचिन एक महान बल्लेबाज है. उनके कव्हर ड्राइव की तो पूरी दुनिया दीवानी है।

पर सचिन को सचिन किसने बनाया ये आप कम ही लोग जानते होगें।सचिन के जीवन के नारायण है अचरेकर सर,जिन्होंने सचिन को क्रिकेट की बी सी डी  सिखाई,

आचरेकर सर को सचिन को तराशने का श्रेय जाता है.

सचिन तेंडुलकर ने उनके योगदान का उल्लेख कई बार किया है।सचिन ने कई इंटरव्यू में कहा है
आचरेकर सर ना होते तो में सचिन तेंडुलकर कभी बन नही पाता

कहानी उस वक्त की है जब सचिन बांद्रा के इंग्लिश स्कूल में पढ़ते थे, आचरेकर सर ने उनका हुनर तराशके सचिन को शारदाआश्रम विद्यालय में एडमिशन लेने को कहा जहां आचरेकर सर क्रिकेट की कोचिंग देते थे।

फिर क्या अपने नारायण की बात मान सचिन शारदाआश्रम गए और उनकी वहा प्रैक्टिस चालू हो गई.महज सोला साल की उम्र में भारत को एक अनमोल हीरा मिल गया जिसका अधिकतर श्रेय आचरेकर सर को जाता है.सही माने तो हर कोई चक्रव्यूह में प्रवेश सहज कर पाता है, पर जो सही सलामत चक्रव्यूह भेद पाए वही तो अर्जुन होता है. भारतीय क्रिकेट जगत में कितने ही धुरंधर आए और दो चार मैच खेल के चले गए. व्यूही नही सचिन को God Of cricket कहा जाता है.अपने गुरु प्रति उनका आदर सराहनीय है।

Aapke Jivan Me Bhi Hai Narayan जैसे आचरेकर सर थे सचिन के नारायण

यशवंत राव चव्हाण

       यशवंतराव चव्हाण और शरद पवार

 

शरद पवार के नारायण

महाराष्ट्र के निर्माण की बात करे तो, महाराष्ट्र को महाराष्ट्र बनाने में कई लोगों ने अपनी आहुति दी है।

1955–1960 का समय महाराष्ट्र में एक क्रांतिकारी दौर था।

मुंबई महाराष्ट्र में रहेगी या गुजरात में इसके लिए लोग सड़कों पे उतर आए थे. रायगड किले पर नेहरू, छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा अनावरण के लिए महाराष्ट्र में  आने वाले थे.महाराष्ट्र में उनके विरोध की एक अलग ही तयारी सुरू थी.

जैसे ही नेहरू रायगड़ में दाखिल हुवे वैसे ही उनको मराठी लोगों द्वारा काले झंडे दिखाए गए.पहली बार मराठी लोगों का गुस्सा और अपने प्रांत के प्रति प्रेमसे नेहरू रूबरू हुए. बड़े संघर्ष के बाद यह तय हुवा की

मुंबई महाराष्ट्र में रहेंगी और 1 मई को महाराष्ट्र राज्य की स्थापना की गई उसके जीत का कलश लेके यशवंत राव चौहान महाराष्ट्र में लौटे.

उन्होंने महाराष्ट्र की नीव रखी.उन्हे आधुनिक महाराष्ट्र का निर्माता भी कहा जाता है.

कैसे बने यशवंतराव चव्हाण शरद पवार के नारायण

बात 80 के दशक की है, शरद पवार कांग्रेस में काम करने लगे थे

कुछ ही दिनों में वो शहर अध्यक्ष बने उनकी महत्वाकांक्षा अधिक थी.

उन्होंने विधायक का चुनाव लढने का फैसला किया पर उस दौर में कांग्रेस स्थानिक कार्यकारिणी जिसका चुनाव करती थी वही विधायक के लिए पात्र होते थे।

स्थानिक संघटना में वोटिंग हुवी शरद पवार को मात्र एक वोट मिला और वो अपात्र ठहरे गए, यही होती है शरद पवार के जीवन में उनके नारायण की एंट्रीयशवंतराव चव्हाण.

यशवंतराव चौहान ने उनका काम देखा था इसी लिए उन्होंने पुर जोर उनका समर्थन किया.उन्होंने सभी को यह कह दिया.

ज्यादा से ज्यादा कांग्रेस की और एक सीट कम हो जायेगी और तो कुछ होगा पर इस लड़के को चुनाव लढ़ना तय हैये था उनका उक्तिवाद.यही से सही मायनो में शरद पवार के राजकीय जीवन की शुरुवात होती है।

शिष्य भी कम नहीं था जैसे जैसे शरद पवार का कद बढ़ता गया उनकी कांग्रेस में अलग पहचान होती गई।

यशवंतराव चव्हाण के कहने पर शरद पवार ने साल 1978 वसंतराव पाटिल की सरकार गिरा दी थी. अपने नारायण के प्रति उनका आदर इसी से समझ आता है उन्होंने कहा था

आपके लिए मैं कौनसी भी  राजकीय कीमत चुकाने के लिए तयार हूं

इन दोनो महाराष्ट्र के कद्दावर नेतावो की ट्रेजेडी एकसमान है दोनो भी अपने जीवन में रक्षा मंत्री बने, पर पात्र होते हुवे भी प्रधानमंत्री बन ना सके.

Aapke Jivan Me Bhi Hai Narayan जैसे यशवंतराव चव्हाण थे शरद पवार के नारायण

“लता मंगेशकर के जीवन के नारायण मास्टर विनायक”

लता मंगेशकर को कौन नहीं जानता, उन्हे भारत की गान कोकिला कहा जाता है।

पंडित जवाहरलाल नेहरू भी उनके गायन के  मुरीद थे,

लता मंगेशकर के पिता दीनानाथ मंगेशकर का उम्र की 42 साल में निधन हो गया।

13 साल की लता पर सभी जिम्मेदारियां पड़ी.

यहीं पर उन्हें मिले उनके जीवन के नारायण उनका नाम था मास्टर विनायक।

उनका जन्म महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में 19 जनवरी 1906 में हुआ था.

उन्होंने कई बेहतरीन फिल्में की उसमें संगम ज्वाला, घर की रानी, छाया जैसी फिल्में शामिल है।

और तो और उन्होंने मंदिर, जीवन यात्रा, बड़ी मां, सुभद्रा,अमृत जैसी बेहतरीन फिल्में निर्देशित की है।

विनायक लता के  पिता दीनानाथ मंगेशकर के मित्र थे और बड़े प्रशंसक भी थे, अपने मित्र के प्रति प्रेम भाव रखते हुए उन्होंने 13 साल की लता को गाने का पहला मौका दिया।

मास्टर विनायक ने लता को 1942 पहला मौका दिया उनकी फिल्म का नाम था मंगलागौर।

आप कम ही लोग जानते होंगे की इसी फिल्म में लता ने अभिनय भी किया था.

आगे चलके उनको एक स्वतंत्र गाना मिला जो साल 1945 मैं आईबड़ी मांफिल्म में था।

यह फिल्म भी मास्टर विनायक ने निर्देशित की थी।

जिस वक्त लता अपने स्थिति से जूझ रही थी उसी वक्त उनके निज जीवन में उनके नारायण की एंट्री हुई।

मास्टर विनायक का असली नाम विनायक कर्नाटकी है.

मास्टर विनायक तो उनका स्क्रीन नाम था

सिनेमैटोग्राफर वासुदेव कर्नाटक के वो भाई और फिल्म निर्माता बाबूराव पेंढारकर के चचेरे भाई थे।

महाराष्ट्र के प्रसिद्ध निर्माता और निर्देशक वी शांताराम के वो मामा थे।

उनकी शुरुआत प्रभात स्टूडियो से हुई.

उन्होंने 1938 मैं आई फिल्म ब्रह्मचारी में पहला अभिनय किया था. जिससे उन्हें बहुत प्रशंसा मिली थी.

पर दुनिया का यही दस्तूर है कि लोग शिष्य को तो याद रखते हैं पर गुरु को भूल जाते है.

कालचक्र इतना लंबा है कि बड़ेबड़े लोग यादों में सिमट जाते हैं.

मास्टर विनायक को बहुत ही कम ही लोग जानते होंगे पर उनका योगदान सराहनीय है. लता के गिरते काल में उन्होंने नारायण बनकर उनका साथ दिया.

Aapke Jivan Me Bhi Hai Narayan जैसे मास्टर विनायक थे लता के नारायण

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