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मणिपुर की हिंसा की पूरी कहानी | Manipur Hinsa

कुछ दिनों पहले आपने सोशल मीडिया पर एक वीडियो देखा ही होगा,जिसमें कई सारे लोग दो लड़कियों को निर्वस्त्र करके घुमा रहे हैं और उनका यौन उत्पीड़न भी कर रहे हैं ।
यह वीडियो देख आपका भी खून खोला होगा आखिर क्या वजह है मणिपुर की हिंसा की पूरी कहानी को जानते हैं आज के इस लेख में. manipur hinsa ki khani.
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आज की घटना से पहले हम मणिपुर का इतिहास जानते हैं, इसी इतिहास में छुपी है मणिपुर के हिसा की पूरी कहानी.मणिपुर में दो समुदाय रहते हैं एक है मैतई तो दूसरा है कुकी, खास करके इन्हीं दो समुदायों में हिंसक झड़प चालू है.
मणिपुर राज्य भारत के पूर्वोत्तर में स्थित राज्य है.
भारत के सेवन सिस्टर में से एक बहन झुलस रही है. मणिपुर की लोकसंख्या की बात की जाए तो यहां पर 1300000 लोग रहते हैं जिसमें बहुसंख्यक है मैतई समुदाय और जबकि लगभग 40 फ़ीसदी कुकी और दूसरा एक समुदाय जिसका नाम नागा समुदाय है. जिन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा दिया गया है।
मणिपुर का इतिहास समझे तो मणिपुर की 90% जमीन पहाड़ी है.
जहां पर कुकी लोग रहते हैं. अनुसूचित जनजाति नियम के अधीन उस जमीन पर सिर्फ अनुसूचित जनजाति में शामिल होने वाले लोग ही जमीन खरीद सकते हैं.पहाड़ी इलाके में मैतई समुदाय जमीन खरीद नही सकते. इसका मतलब सिर्फ 10% जगह पर मैतई समाज खरीद बिक्री कर सकता है.
इसी के लिए मैतई समाज की मांग है कि उन्हें भी अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिले.
उनकी यह मांग लंबे समय से चल रही है. मैतई समुदाय की मांग के विरोध में कुकी जनजाति ने एक मोर्चा निकाला था इसी मोर्चे से शुरू होता है मणिपुर की हिंसा का सिलसिला.
महिलाओं को निर्वस्त्र करने की बात निंदनीय है फिर भी एक संविधानिक राष्ट्र के तौर पर विचार करे तो.
जिस समाज की संख्या 53 फ़ीसदी है वह 10 फ़ीसदी जगह पर रहता है और जिसकी संख्या 45 फ़ीसदी है वह 90% जमीन खरीद सकता है.
विशेष बात यह है कि कुकी लोग इस 10% में भी जगह खरीद सकते हैं I
इसी अन्याय को सहते हुए मैतई समाज सड़क पर उतर आया है.यही है मणिपुर की हिंसा की पूरी कहानी .Manipur hinsa ki kahan.
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जानते हैं मणिपुर में रहने वाले 3 जातियों के बारे में
कुकी जनजाति यह एक आदिवासी जनजाति है. जो खास करके भारत के मणिपुर और मिजोरम राज्य के दक्षिण पूर्वी भाग में रहती है कुकी जनजाति आमतौर पर भारत, मैनमार और बांग्लादेश में पाए जाने वाली एक पहाड़ी जाती है.
मणिपुर की आबादी का विचार किया जाए तो पूरी आबादी में कुकी और दूसरी जाति नागा जाति की संख्या लगभग 40% है पर इन्होंने मणिपुर की 90% प्रतिशत भूमि काबिज की है.
कुकी समाज आदिवासी जनजाति है जिनका अधिक तौर पर धर्मांतर हुआ है और उन्होंने ईसाई धर्म अपनाया है.
मैतई वह समाज है जो संख्या के हिसाब से विचार किया जाए तो मणिपुर में सर्वाधिक है यह बहुसंख्य समाज है.
खास करके मैतई समाज राजधानी इंफाल में रहता है.इन्हें मणिपुरी भी कहा जाता है ऐसा मानते हैं कि इस समाज की कुल आबादी 65 फ़ीसदी है पर फिर भी इन्होंने व्याप्त की की जमीन सिर्फ 10% है.
मैतई समाज में ज्यादातर हिंदू लोग हैं. जबकि नागा और कुकी समुदाय इसाई है.
मैतई राज्य करने वाली जाती है. उसकी मणिपुर की सियासत में अच्छी खासी पकड़ है. कुल मणिपुर के विधानसभा क्षेत्र का विचार किया जाए तो 40 सीटों पर मैतई समाज का वर्चस्व है. जो इंफाल घाट क्षेत्र से आती है. शिक्षा के तौर पर भी विचार किया जाए तो मैतई समाज कुकी और नागावो की तुलना में बहुत ज्यादा शिक्षित है
कुकी जनजाति का इतिहास जानना है तो इस समाज को मैतई राजाओं द्वारा ही स्थापित किया गया है.जिन्हें नागवो के विरुद्ध लढने के लिय लाया गया था.ये है  Manipur hinsa ki kahan दूसरी वजह.
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3 मई के बाद अब तक क्या क्या हुआ है?
मणिपुर की हिंसा के बाद अमित शाह ने किया था मणिपुर का दौरा मणिपुर में हो रही हिंसा को रोकने के लिए भारत के गृह मंत्री अमित शाह ने मणिपुर का दौरा किया था और उन्होंने वहां के दोनों समुदायों के वरिष्ठ नेताओं से बातचीत की थीमहिलाओं को निर्वस्त्र घुमाने का वीडियो सामने आने पर बहुत से राजकीय लोगों, बॉलीवुड के कलाकार और समाजसेवकों ने इसका पुरजोर से विरोध किया है.
“यह भारत को कलंकित करने वाली बात है”
आज एक साथ खड़ा रहने वाला नागा समुदाय जो कुकी का साथ दे रहा है वह कभी कुकी समुदाय का विरोधी था. कुकी और नागावो के बीच में भी बहुत सारी झड़पे हो चुकी है.1993 हुई हिंसा में 700 से ज्यादा लोग मारे गए थे.आप जान ही चुके होंगे मणिपुर हिंसा की पूरी कहानी.
Karn Mahabharat Ka Mahan Youdha

कर्ण महाभारत का महान योद्धा(karn mahabharat ka mahan youdha)

जानिये महाभारत के कर्ण के बारे में कुछ रोचक बातें


आपको पता ही होगा की जब महाभारत की बात होती है पहले जिक्र आता है, महाभारत में सबसे महान योद्धा कोन था?

संजोग की बात यह है की महाभारत काल में भी कर्ण और अर्जुन की तुलना होती थी।
महाभारत घटे हुवे 5000 साल हो गए हैं फिर भी आज भी कर्ण और अर्जुन की तुलना की जाती है

कर्ण महाभारत का ऐसा पात्र है जिस पर परिस्थिति ने समाज ने और जीवन ने अन्याय किये थे फिर भी वह लड़ता रहा अपने कर्मों को सर्वोपरि मानते हुवे अपमान सेहता रहा.

आज जानेंगे की महाभारत के कर्ण के बारे में कुछ रोचक बातें

Karn Mahabharat Ka Mahan Youdha

युधिष्ठिर नहीं, कर्ण था जेस्ट पांडव,

जितनी कर्ण की जीवनी दिलचस्प है उतना ही उसका जन्म भी दिलचस्प है।
विवाह पूर्व माता कुंती को दुर्वासा ऋषि की सेवा स्वरूप 6 वरदान मिले थे और उस वरदान के स्वरूप में वह जिस भी देवताओं को स्मरण करेगी उस देवतावो के गुण लेकर उसको पुत्र प्राप्त होंगे पर कुंती को दुर्वासा ऋषि के वरदान पर संशय  निर्माण हुआ और विवाह पूर्व ही उसने एक वरदान का उपयोग किया, सूर्य देव को स्मरण करते हुए उसने वह मंत्र पढ़ा और मंत्र स्वरूप उसको विवाह पूर्व ही पुत्र प्राप्त हुआ. विवाह पूर्व प्राप्त हुए पुत्र को देखकर कुंती घबराई,उसे समझ नहीं आया कि अब क्या करें, समाज में कलंकित होने के भय से अंततः कुंती और उसकी दासी ने उस पुत्र को एक टोकरी में गंगा प्रभाव में छोड़ दिया. जो बहता हुवा अधिरथ और माता राधा को मिला,जिन्होंने कर्ण का पालन पोषण किया.

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कर्ण को क्यों था दुर्योधन इतना प्रिय(karn mahabharat ka mahan youdha)

महाभारत जितनी दुश्मनी की कहानी है उतनी ही दोस्ती की भी कहानी है जब भी दुर्योधन मुसीबत में पड़ जाता उसे कर्ण बचा लेता.
कीतनी ही बार कर्ण ने दुर्योधन को बचा लिया था.

इनकी मित्रता की कहानी सुरू होती है जब एक बार गुरु द्रोणाचार्य ने एक प्रतियोगिता रखी जिसमें सभी शिष्य को अपनी अपनी कला सादर करनी थी.
इस प्रतियोगिता में सभी अपने अपने हुनर दिखा रहे थे, अर्जुन ने तो ऐसे ऐसे करतब दिखाये, जिसे देख सभी प्रजागन दंग हो गये, अर्जुन के समीप जाता कोई भी और दूसरा धनुर्धर नहीं था.
तभी उस प्रतियोगिता में कर्ण सहभागी होता है और जो करतब अर्जुन ने दिखाये थे वही सारे करतब कर्ण भी दिखाता है.
अर्जुन को कोई तो टक्कर देने के लिये है इस बात से दुर्योधन आनंदित हो जाता है और कर्ण को गले लगा लेता है.कर्ण जब अर्जुन को चुनौती देता है तभी गुरु द्रोणाचार्य बीच में आके उसे रोक कहते है “यह प्रतियोगिता सिर्फ युवराजो के लिए है. तुम बताओ तुम किस राज्य के युवराज हो” यह सुन कर्ण कुछ नहीं बोल पाता.
यह बात सुनके और कर्ण का कौशल देख दुर्योधन उसे अंग देश का राजा घोषित करता है.
कुछ ही देर पहले मिले एक अनजान व्यक्ति को दुर्योधन ने एक राज्य का राजा घोषित कर दिया इस बात से कर्ण अचंभित हो जाता है इतना प्रेम उसे अभी तक किसी से नहीं मिला था. कर्ण मनोमन दुर्योधन को अपना सखा,अपना मित्र मान लेता है।
कर्ण के जीवन में ऐसी बहुत सी घटनाएं है जो ना घटती तो कर्ण का जीवन कुछ अलग ही होता,

karn durwodhan

जानते हैं वह दो श्राप जिसकी वजह से कर्ण की मृत्यु हुई थी ।

पहला श्राप उस ब्राह्मण द्वारा कर्ण को मिला था।
जिसके गाय के बछड़े को कर्ण ने गलती से मार दिया था, क्रोधित होकर उस ब्राह्मण ने कर्ण को श्राप दे दिया, श्राप का स्वरूप इस प्रकार था कि जिस प्रकार कीचड़ में फंसे उस असहाय बछड़े को कर्ण ने मारा है उसी तरह जिस युद्ध के लिये वो अपना जीवन व्यतीत कर के शस्त्र अस्त्र जमा रहा है उसी अंतिम युद्ध में उसके रथ का पहिया जमीन निगल लेगी.

दूसरा श्राप कर्ण को मिला था उसके गुरु परशुराम द्वारा, जब कर्ण परशुराम जी की सेवा कर रहा था।
परशुराम कर्ण के जांघों पर अपना सिर टिकाए सो रहे थे।
उसी वक्त एक भ्रमर कर्ण के जांघों पर काटने लगा, कर्ण जैसे उस भ्रमर को दूर करने का प्रयत्न करता उसी वक्त गुरु परशुराम जी की नींद खुलने लगती।
अपने गुरु की नींद ना खुले इसलिये कर्ण उस भ्रमर के काटने पर भी शांतता पूर्वक वेदनाये सहता रहा पर उसकी जांघों से इतना खून निकला कि खून की धारा परशुराम जी के शरीर तक जा पहुंची और खून की गर्मी से परशुराम जी की नींद खुली, उन्होंने देखा की इतनी यातनाये सहन करते हुवे भी कर्ण किंचित भी विचलित नही हुवा.क्रोधित होते हुवे परशुराम बोले
“किसी ब्राह्मण में इतनी सहनशीलता हो ही नहीं सकती जरूर तुम क्षत्रिय हो”
इस बात से परशुराम बहुत क्रोधित हुवे क्योंकि उन्होंने शपथ ली थी कि वह किसी ब्राह्मण को ही शिक्षा देंगे, ना किसी क्षत्रिय या शूद्र को शिक्षा देंगे।
कर्ण ने उनसे छल से ज्ञान प्राप्त किया था। इसी क्रोध वर्ष परशुराम जी ने श्राप दे दिया कि तुम जिस वजह से शिक्षा प्राप्त कर रहे हो उसे अंतिम युद्ध में तुम भूल जावोगे।
तुम्हें मैने सिखाएं दिए हुए कोई भी शस्त्र अस्त्र याद नहीं रहेंगे।
और होता भी वही है, दोनों श्राप कर्ण के अंतिम युद्ध में ही कार्य करने लगते हैं ।
जब कर्ण का और अर्जुन का अंतिम युद्ध चालू होता है, तभी जमीन कर्ण के रथ का पहिया निगल लेती है।
कर्ण जैसे ही एक हाथ से पहिया निकाल कर दूसरे हाथ से अर्जुन के साथ युद्ध लड़ने लगता है तभी दूसरा श्राप कार्यान्वित होता है।
कर्ण सारे मंत्र भूल जाता है। वह कोई भी शस्त्र प्रकट नहीं कर पाता और अंतिम था कृष्ण के कहने पर अर्जुन कर्ण का वध कर देता है।

कृष्ण केहते है Karn tum ek Mahabharat Me yaad rehne Wale mahan youdha ho

पता चलता है कि पांडव उसके भाई है


किसी इंसान को हराना हो तो पहले उसकी कल्पनावो को मा र दो,दूसरा उसके सपने को मार दो।
जब आदमी मन से मर जाता है तो कतई वास्तविक जीवन में वह जीत नहीं पाता। युद्ध से पहले ही कृष्ण ने युद्ध जीत लिया था क्योंकि भगवान कृष्ण कर्ण को वह सत्य बताते हैं जिस सत्य की खोज में कर्ण ने अपना पूरा जीवन व्यतीत किया था।
कृष्ण कर्ण को बताते हैं कि उसकी असली माता कुंती है और पांच पांडव उसके छोटे भाई हैं।
कर्ण कृष्ण से कहता है,
“केशव आज ही क्यों? यह आज बताना जरूरी था?
अब मेरे बान शक्तिहीन हो जाएंगे।
मैं मेरे भाइयों पर बान कैसे चला पाऊंगा।
प्रत्यंचा खींचते समय मेरी आत्मा जो ऊर्जा निर्माण करती है वह अब नहीं कर पाएगी क्योंकि आपने मेरी आत्मा पर प्रेम का पर्दा बिछा दिया है.
केशव सत्य सदेव सत्य रहता है पर आप से अधिक कौन जान सकता है कि उस सत्य को किस समय बताना है।
सत्य को भी आपने एक युद्ध की रणनीति बना दिया.

krishn karn meet

जब कर्ण को पता चलता है की कुंती उसकी माता है ।

कुंती की प्रथम भेट के वक्त कुंति कर्ण से वचन मांगती है कि वह पांचो पांडव में से किसी को नहीं मारेगा।
पर कर्ण कुंती को कहता है कि माते तुम्हारे पाच पुत्र जीवित रहेंगे उनमें
मैं तुम्हारे चारों पुत्र को जीवन दान देता हूं।
पर मैं अर्जुन से युद्ध करूंगा एक तो अर्जुन जीवित रहेगा या मैं।
अपनी माता को दिए वचन का कर्ण पूरे मन से पालन करते हैं युधिष्ठिर, भीम, नकुल व सहदेव सभी को युद्ध में परास्त कर देता है पर सबको जीवित छोड़ देता है।
कर्ण जैसा महान योद्धा दूसरा और कोई हो नही सकता.


karn mahabharat ka mahan youdha था इसमें कोई दो राय नहीं है
sachune ke narayan

आपके जीवन में भी है कोई नारायण जिसने बदला हो आपका जीवन / Aapke JIvan Me Bhi Hai Narayan

सभी के जीवन में होते है नारायण।

आपने वो गाना तो सुना ही होगापता नहीं किस रूप में नारायण मिल जाएगायकीन मानिए हमारे सभी के जीवन में ऐसे नारायण होते है.जो मिल जाने से हमारा जीवन बदल  जाता है.किसी के जीवन में वो नारायण उनके गुरु हो सकते है. किसी के जीवन में उनके दोस्त या सहकर्मी हो सकते हैं. किसी के जीवन में उनकी पत्नी हो सकती है.

ये नारायण हमारे जीवन में यैसे प्रवेश करते है, जैसे किसी बंजर जमीन पर उगा पौधा मरने को हो और अचानक बारिश हो जाए…. उस पौधे के लिए वो बरसात नारायण ही हुवी ना! Aapke JIvan Me Bhi Hai Narayan

तो आज जानते है कुछ यैसे लोगों के जीवन के नारायण के बारे में.नारायण आने से बदल गया इनका जीवन

“आचरेकर सर बने थे सचिन के नारायण”

सचिन तेंडुलकर: इसमें कोई दो राय नहीं की सचिन एक महान बल्लेबाज है. उनके कव्हर ड्राइव की तो पूरी दुनिया दीवानी है।

पर सचिन को सचिन किसने बनाया ये आप कम ही लोग जानते होगें।सचिन के जीवन के नारायण है अचरेकर सर,जिन्होंने सचिन को क्रिकेट की बी सी डी  सिखाई,

आचरेकर सर को सचिन को तराशने का श्रेय जाता है.

सचिन तेंडुलकर ने उनके योगदान का उल्लेख कई बार किया है।सचिन ने कई इंटरव्यू में कहा है
आचरेकर सर ना होते तो में सचिन तेंडुलकर कभी बन नही पाता

कहानी उस वक्त की है जब सचिन बांद्रा के इंग्लिश स्कूल में पढ़ते थे, आचरेकर सर ने उनका हुनर तराशके सचिन को शारदाआश्रम विद्यालय में एडमिशन लेने को कहा जहां आचरेकर सर क्रिकेट की कोचिंग देते थे।

फिर क्या अपने नारायण की बात मान सचिन शारदाआश्रम गए और उनकी वहा प्रैक्टिस चालू हो गई.महज सोला साल की उम्र में भारत को एक अनमोल हीरा मिल गया जिसका अधिकतर श्रेय आचरेकर सर को जाता है.सही माने तो हर कोई चक्रव्यूह में प्रवेश सहज कर पाता है, पर जो सही सलामत चक्रव्यूह भेद पाए वही तो अर्जुन होता है. भारतीय क्रिकेट जगत में कितने ही धुरंधर आए और दो चार मैच खेल के चले गए. व्यूही नही सचिन को God Of cricket कहा जाता है.अपने गुरु प्रति उनका आदर सराहनीय है।

Aapke Jivan Me Bhi Hai Narayan जैसे आचरेकर सर थे सचिन के नारायण

यशवंत राव चव्हाण

       यशवंतराव चव्हाण और शरद पवार

 

शरद पवार के नारायण

महाराष्ट्र के निर्माण की बात करे तो, महाराष्ट्र को महाराष्ट्र बनाने में कई लोगों ने अपनी आहुति दी है।

1955–1960 का समय महाराष्ट्र में एक क्रांतिकारी दौर था।

मुंबई महाराष्ट्र में रहेगी या गुजरात में इसके लिए लोग सड़कों पे उतर आए थे. रायगड किले पर नेहरू, छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा अनावरण के लिए महाराष्ट्र में  आने वाले थे.महाराष्ट्र में उनके विरोध की एक अलग ही तयारी सुरू थी.

जैसे ही नेहरू रायगड़ में दाखिल हुवे वैसे ही उनको मराठी लोगों द्वारा काले झंडे दिखाए गए.पहली बार मराठी लोगों का गुस्सा और अपने प्रांत के प्रति प्रेमसे नेहरू रूबरू हुए. बड़े संघर्ष के बाद यह तय हुवा की

मुंबई महाराष्ट्र में रहेंगी और 1 मई को महाराष्ट्र राज्य की स्थापना की गई उसके जीत का कलश लेके यशवंत राव चौहान महाराष्ट्र में लौटे.

उन्होंने महाराष्ट्र की नीव रखी.उन्हे आधुनिक महाराष्ट्र का निर्माता भी कहा जाता है.

कैसे बने यशवंतराव चव्हाण शरद पवार के नारायण

बात 80 के दशक की है, शरद पवार कांग्रेस में काम करने लगे थे

कुछ ही दिनों में वो शहर अध्यक्ष बने उनकी महत्वाकांक्षा अधिक थी.

उन्होंने विधायक का चुनाव लढने का फैसला किया पर उस दौर में कांग्रेस स्थानिक कार्यकारिणी जिसका चुनाव करती थी वही विधायक के लिए पात्र होते थे।

स्थानिक संघटना में वोटिंग हुवी शरद पवार को मात्र एक वोट मिला और वो अपात्र ठहरे गए, यही होती है शरद पवार के जीवन में उनके नारायण की एंट्रीयशवंतराव चव्हाण.

यशवंतराव चौहान ने उनका काम देखा था इसी लिए उन्होंने पुर जोर उनका समर्थन किया.उन्होंने सभी को यह कह दिया.

ज्यादा से ज्यादा कांग्रेस की और एक सीट कम हो जायेगी और तो कुछ होगा पर इस लड़के को चुनाव लढ़ना तय हैये था उनका उक्तिवाद.यही से सही मायनो में शरद पवार के राजकीय जीवन की शुरुवात होती है।

शिष्य भी कम नहीं था जैसे जैसे शरद पवार का कद बढ़ता गया उनकी कांग्रेस में अलग पहचान होती गई।

यशवंतराव चव्हाण के कहने पर शरद पवार ने साल 1978 वसंतराव पाटिल की सरकार गिरा दी थी. अपने नारायण के प्रति उनका आदर इसी से समझ आता है उन्होंने कहा था

आपके लिए मैं कौनसी भी  राजकीय कीमत चुकाने के लिए तयार हूं

इन दोनो महाराष्ट्र के कद्दावर नेतावो की ट्रेजेडी एकसमान है दोनो भी अपने जीवन में रक्षा मंत्री बने, पर पात्र होते हुवे भी प्रधानमंत्री बन ना सके.

Aapke Jivan Me Bhi Hai Narayan जैसे यशवंतराव चव्हाण थे शरद पवार के नारायण

“लता मंगेशकर के जीवन के नारायण मास्टर विनायक”

लता मंगेशकर को कौन नहीं जानता, उन्हे भारत की गान कोकिला कहा जाता है।

पंडित जवाहरलाल नेहरू भी उनके गायन के  मुरीद थे,

लता मंगेशकर के पिता दीनानाथ मंगेशकर का उम्र की 42 साल में निधन हो गया।

13 साल की लता पर सभी जिम्मेदारियां पड़ी.

यहीं पर उन्हें मिले उनके जीवन के नारायण उनका नाम था मास्टर विनायक।

उनका जन्म महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में 19 जनवरी 1906 में हुआ था.

उन्होंने कई बेहतरीन फिल्में की उसमें संगम ज्वाला, घर की रानी, छाया जैसी फिल्में शामिल है।

और तो और उन्होंने मंदिर, जीवन यात्रा, बड़ी मां, सुभद्रा,अमृत जैसी बेहतरीन फिल्में निर्देशित की है।

विनायक लता के  पिता दीनानाथ मंगेशकर के मित्र थे और बड़े प्रशंसक भी थे, अपने मित्र के प्रति प्रेम भाव रखते हुए उन्होंने 13 साल की लता को गाने का पहला मौका दिया।

मास्टर विनायक ने लता को 1942 पहला मौका दिया उनकी फिल्म का नाम था मंगलागौर।

आप कम ही लोग जानते होंगे की इसी फिल्म में लता ने अभिनय भी किया था.

आगे चलके उनको एक स्वतंत्र गाना मिला जो साल 1945 मैं आईबड़ी मांफिल्म में था।

यह फिल्म भी मास्टर विनायक ने निर्देशित की थी।

जिस वक्त लता अपने स्थिति से जूझ रही थी उसी वक्त उनके निज जीवन में उनके नारायण की एंट्री हुई।

मास्टर विनायक का असली नाम विनायक कर्नाटकी है.

मास्टर विनायक तो उनका स्क्रीन नाम था

सिनेमैटोग्राफर वासुदेव कर्नाटक के वो भाई और फिल्म निर्माता बाबूराव पेंढारकर के चचेरे भाई थे।

महाराष्ट्र के प्रसिद्ध निर्माता और निर्देशक वी शांताराम के वो मामा थे।

उनकी शुरुआत प्रभात स्टूडियो से हुई.

उन्होंने 1938 मैं आई फिल्म ब्रह्मचारी में पहला अभिनय किया था. जिससे उन्हें बहुत प्रशंसा मिली थी.

पर दुनिया का यही दस्तूर है कि लोग शिष्य को तो याद रखते हैं पर गुरु को भूल जाते है.

कालचक्र इतना लंबा है कि बड़ेबड़े लोग यादों में सिमट जाते हैं.

मास्टर विनायक को बहुत ही कम ही लोग जानते होंगे पर उनका योगदान सराहनीय है. लता के गिरते काल में उन्होंने नारायण बनकर उनका साथ दिया.

Aapke Jivan Me Bhi Hai Narayan जैसे मास्टर विनायक थे लता के नारायण