Karn Mahabharat Ka Mahan Youdha

कर्ण महाभारत का महान योद्धा(karn mahabharat ka mahan youdha)

जानिये महाभारत के कर्ण के बारे में कुछ रोचक बातें


आपको पता ही होगा की जब महाभारत की बात होती है पहले जिक्र आता है, महाभारत में सबसे महान योद्धा कोन था?

संजोग की बात यह है की महाभारत काल में भी कर्ण और अर्जुन की तुलना होती थी।
महाभारत घटे हुवे 5000 साल हो गए हैं फिर भी आज भी कर्ण और अर्जुन की तुलना की जाती है

कर्ण महाभारत का ऐसा पात्र है जिस पर परिस्थिति ने समाज ने और जीवन ने अन्याय किये थे फिर भी वह लड़ता रहा अपने कर्मों को सर्वोपरि मानते हुवे अपमान सेहता रहा.

आज जानेंगे की महाभारत के कर्ण के बारे में कुछ रोचक बातें

Karn Mahabharat Ka Mahan Youdha

युधिष्ठिर नहीं, कर्ण था जेस्ट पांडव,

जितनी कर्ण की जीवनी दिलचस्प है उतना ही उसका जन्म भी दिलचस्प है।
विवाह पूर्व माता कुंती को दुर्वासा ऋषि की सेवा स्वरूप 6 वरदान मिले थे और उस वरदान के स्वरूप में वह जिस भी देवताओं को स्मरण करेगी उस देवतावो के गुण लेकर उसको पुत्र प्राप्त होंगे पर कुंती को दुर्वासा ऋषि के वरदान पर संशय  निर्माण हुआ और विवाह पूर्व ही उसने एक वरदान का उपयोग किया, सूर्य देव को स्मरण करते हुए उसने वह मंत्र पढ़ा और मंत्र स्वरूप उसको विवाह पूर्व ही पुत्र प्राप्त हुआ. विवाह पूर्व प्राप्त हुए पुत्र को देखकर कुंती घबराई,उसे समझ नहीं आया कि अब क्या करें, समाज में कलंकित होने के भय से अंततः कुंती और उसकी दासी ने उस पुत्र को एक टोकरी में गंगा प्रभाव में छोड़ दिया. जो बहता हुवा अधिरथ और माता राधा को मिला,जिन्होंने कर्ण का पालन पोषण किया.

kunti

कर्ण को क्यों था दुर्योधन इतना प्रिय(karn mahabharat ka mahan youdha)

महाभारत जितनी दुश्मनी की कहानी है उतनी ही दोस्ती की भी कहानी है जब भी दुर्योधन मुसीबत में पड़ जाता उसे कर्ण बचा लेता.
कीतनी ही बार कर्ण ने दुर्योधन को बचा लिया था.

इनकी मित्रता की कहानी सुरू होती है जब एक बार गुरु द्रोणाचार्य ने एक प्रतियोगिता रखी जिसमें सभी शिष्य को अपनी अपनी कला सादर करनी थी.
इस प्रतियोगिता में सभी अपने अपने हुनर दिखा रहे थे, अर्जुन ने तो ऐसे ऐसे करतब दिखाये, जिसे देख सभी प्रजागन दंग हो गये, अर्जुन के समीप जाता कोई भी और दूसरा धनुर्धर नहीं था.
तभी उस प्रतियोगिता में कर्ण सहभागी होता है और जो करतब अर्जुन ने दिखाये थे वही सारे करतब कर्ण भी दिखाता है.
अर्जुन को कोई तो टक्कर देने के लिये है इस बात से दुर्योधन आनंदित हो जाता है और कर्ण को गले लगा लेता है.कर्ण जब अर्जुन को चुनौती देता है तभी गुरु द्रोणाचार्य बीच में आके उसे रोक कहते है “यह प्रतियोगिता सिर्फ युवराजो के लिए है. तुम बताओ तुम किस राज्य के युवराज हो” यह सुन कर्ण कुछ नहीं बोल पाता.
यह बात सुनके और कर्ण का कौशल देख दुर्योधन उसे अंग देश का राजा घोषित करता है.
कुछ ही देर पहले मिले एक अनजान व्यक्ति को दुर्योधन ने एक राज्य का राजा घोषित कर दिया इस बात से कर्ण अचंभित हो जाता है इतना प्रेम उसे अभी तक किसी से नहीं मिला था. कर्ण मनोमन दुर्योधन को अपना सखा,अपना मित्र मान लेता है।
कर्ण के जीवन में ऐसी बहुत सी घटनाएं है जो ना घटती तो कर्ण का जीवन कुछ अलग ही होता,

karn durwodhan

जानते हैं वह दो श्राप जिसकी वजह से कर्ण की मृत्यु हुई थी ।

पहला श्राप उस ब्राह्मण द्वारा कर्ण को मिला था।
जिसके गाय के बछड़े को कर्ण ने गलती से मार दिया था, क्रोधित होकर उस ब्राह्मण ने कर्ण को श्राप दे दिया, श्राप का स्वरूप इस प्रकार था कि जिस प्रकार कीचड़ में फंसे उस असहाय बछड़े को कर्ण ने मारा है उसी तरह जिस युद्ध के लिये वो अपना जीवन व्यतीत कर के शस्त्र अस्त्र जमा रहा है उसी अंतिम युद्ध में उसके रथ का पहिया जमीन निगल लेगी.

दूसरा श्राप कर्ण को मिला था उसके गुरु परशुराम द्वारा, जब कर्ण परशुराम जी की सेवा कर रहा था।
परशुराम कर्ण के जांघों पर अपना सिर टिकाए सो रहे थे।
उसी वक्त एक भ्रमर कर्ण के जांघों पर काटने लगा, कर्ण जैसे उस भ्रमर को दूर करने का प्रयत्न करता उसी वक्त गुरु परशुराम जी की नींद खुलने लगती।
अपने गुरु की नींद ना खुले इसलिये कर्ण उस भ्रमर के काटने पर भी शांतता पूर्वक वेदनाये सहता रहा पर उसकी जांघों से इतना खून निकला कि खून की धारा परशुराम जी के शरीर तक जा पहुंची और खून की गर्मी से परशुराम जी की नींद खुली, उन्होंने देखा की इतनी यातनाये सहन करते हुवे भी कर्ण किंचित भी विचलित नही हुवा.क्रोधित होते हुवे परशुराम बोले
“किसी ब्राह्मण में इतनी सहनशीलता हो ही नहीं सकती जरूर तुम क्षत्रिय हो”
इस बात से परशुराम बहुत क्रोधित हुवे क्योंकि उन्होंने शपथ ली थी कि वह किसी ब्राह्मण को ही शिक्षा देंगे, ना किसी क्षत्रिय या शूद्र को शिक्षा देंगे।
कर्ण ने उनसे छल से ज्ञान प्राप्त किया था। इसी क्रोध वर्ष परशुराम जी ने श्राप दे दिया कि तुम जिस वजह से शिक्षा प्राप्त कर रहे हो उसे अंतिम युद्ध में तुम भूल जावोगे।
तुम्हें मैने सिखाएं दिए हुए कोई भी शस्त्र अस्त्र याद नहीं रहेंगे।
और होता भी वही है, दोनों श्राप कर्ण के अंतिम युद्ध में ही कार्य करने लगते हैं ।
जब कर्ण का और अर्जुन का अंतिम युद्ध चालू होता है, तभी जमीन कर्ण के रथ का पहिया निगल लेती है।
कर्ण जैसे ही एक हाथ से पहिया निकाल कर दूसरे हाथ से अर्जुन के साथ युद्ध लड़ने लगता है तभी दूसरा श्राप कार्यान्वित होता है।
कर्ण सारे मंत्र भूल जाता है। वह कोई भी शस्त्र प्रकट नहीं कर पाता और अंतिम था कृष्ण के कहने पर अर्जुन कर्ण का वध कर देता है।

कृष्ण केहते है Karn tum ek Mahabharat Me yaad rehne Wale mahan youdha ho

पता चलता है कि पांडव उसके भाई है


किसी इंसान को हराना हो तो पहले उसकी कल्पनावो को मा र दो,दूसरा उसके सपने को मार दो।
जब आदमी मन से मर जाता है तो कतई वास्तविक जीवन में वह जीत नहीं पाता। युद्ध से पहले ही कृष्ण ने युद्ध जीत लिया था क्योंकि भगवान कृष्ण कर्ण को वह सत्य बताते हैं जिस सत्य की खोज में कर्ण ने अपना पूरा जीवन व्यतीत किया था।
कृष्ण कर्ण को बताते हैं कि उसकी असली माता कुंती है और पांच पांडव उसके छोटे भाई हैं।
कर्ण कृष्ण से कहता है,
“केशव आज ही क्यों? यह आज बताना जरूरी था?
अब मेरे बान शक्तिहीन हो जाएंगे।
मैं मेरे भाइयों पर बान कैसे चला पाऊंगा।
प्रत्यंचा खींचते समय मेरी आत्मा जो ऊर्जा निर्माण करती है वह अब नहीं कर पाएगी क्योंकि आपने मेरी आत्मा पर प्रेम का पर्दा बिछा दिया है.
केशव सत्य सदेव सत्य रहता है पर आप से अधिक कौन जान सकता है कि उस सत्य को किस समय बताना है।
सत्य को भी आपने एक युद्ध की रणनीति बना दिया.

krishn karn meet

जब कर्ण को पता चलता है की कुंती उसकी माता है ।

कुंती की प्रथम भेट के वक्त कुंति कर्ण से वचन मांगती है कि वह पांचो पांडव में से किसी को नहीं मारेगा।
पर कर्ण कुंती को कहता है कि माते तुम्हारे पाच पुत्र जीवित रहेंगे उनमें
मैं तुम्हारे चारों पुत्र को जीवन दान देता हूं।
पर मैं अर्जुन से युद्ध करूंगा एक तो अर्जुन जीवित रहेगा या मैं।
अपनी माता को दिए वचन का कर्ण पूरे मन से पालन करते हैं युधिष्ठिर, भीम, नकुल व सहदेव सभी को युद्ध में परास्त कर देता है पर सबको जीवित छोड़ देता है।
कर्ण जैसा महान योद्धा दूसरा और कोई हो नही सकता.


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